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Feb 8, 2025

Train window

 दिनांक 7-02-2025 लोहे के घर की यात्रा। मदुरई से त्रिवेंद्रम।















Jul 1, 2017

मजदूर








ये तीन तस्वीरें #ट्रेन की खिड़की से लिए गए हैं. अपनी ट्रेन शिवपुर रेलवे स्टेशन, वाराणसी के प्लेटफोर्म पर रुकी सामने एक मालगाड़ी से खाद के बोरे उतारे जा रहे थे.  

Mar 27, 2014

पानी लाया, कपड़े धो लो...


लोहे का घर ऐसे-ऐसे दृश्य दिखाता है कि कलेजा हिल जाता है! सुबह का समय था। प्लेटफॉर्म में गाड़ी रूकी थी। दूर एक गरीब महिला कपड़े साफ़ कर रही थी। उसका एक या दो वर्ष का नन्हाँ बालक सामने रखे प्लास्टिक के ड्रम से निकालकर लागातार लोटे में पानी लाये जा रहा था। माँ दुखी मन से कपड़े धोये जा रही थी। इन दृश्यों को देखकर बचपन में अपनी पाठ्य-पुस्तक में पढ़ी स्व0 अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध की लिखी यह बाल कविता याद आ गई। जिसमें कवि कल्पना करता है कि माँ अपने बच्चे को जगाती है, मुँह धोने के लिए पानी लाती है और यह गीत गाती है....

उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लाई हूँ, मुँह धो लो।



यहाँ तो 'लाल' कह रहा है...

रूको माँ! अब आँसू पोछो
पानी लाया,  कपड़े धो लो।
.............

Jan 23, 2014

लोहे के घर की खिड़की कहानियाँ दिखाती हैं!

इस झोपड़ी में एक बुढ़िया दादी रहती थीं।


 धूप में ऐसे बैठी रहती  थीं।


ईश्वर करे स्वस्थ हों, हाड़ कंपाती ठंड में रजाई से दुबकी सो रही हों।

Jan 7, 2014

धरती

धानी रंग ओढ़े चुनरी...


ओढ़े सरसों


धानी रंग ओढ़े चुनरी
ओढ़े सरसों
मन ना अघाये माई!
देखा बरसों।
.....................

Sep 21, 2013

मेरी लाइन क्लियर हुई तेरे जाने के बाद..!


जान में जान आई तेरे आने के बाद



मेरी लाइन क्लीयर हुई तेरे जाने के बाद


तू सुपरफॉस्ट 
मैं पैसिंजर।

Sep 14, 2013

पैसिंजर ट्रेन और रोज के यात्री

 सूर्योदय से पहले शुरू हो जाती है यात्रा


वापसी - सूर्यास्त के समय 




गोधूलि बेला में घरों को लौट रहे हैं चौपाये भी...



सूर्योदय, सूर्यास्त से बेखबर फेंट रहे हैं तास के बावन पत्ते। पता नहीं ये फेंट रहे हैं पत्ते या वक्त इन्हें फेंट रहा है, तास के पत्तों की तरह। 


चौपायों और दो पायों में एक बड़ा फ़र्क दिखता है। चौपायों के झुंड के साथ दिखती है लाठी और हाँकने वाला। दो पायों के झुँड के साथ लाठी और हाँकने वाला दोनो अदृश्य हैं।