दिनांक 7-02-2025 लोहे के घर की यात्रा। मदुरई से त्रिवेंद्रम।
Showing posts with label लोहे के घर से. Show all posts
Showing posts with label लोहे के घर से. Show all posts
Feb 8, 2025
Jul 26, 2024
Jul 22, 2024
Jan 21, 2023
Nov 3, 2022
Jul 1, 2017
Apr 3, 2014
Mar 27, 2014
पानी लाया, कपड़े धो लो...
लोहे का घर ऐसे-ऐसे दृश्य दिखाता है कि कलेजा हिल जाता है! सुबह का समय था। प्लेटफॉर्म में गाड़ी रूकी थी। दूर एक गरीब महिला कपड़े साफ़ कर रही थी। उसका एक या दो वर्ष का नन्हाँ बालक सामने रखे प्लास्टिक के ड्रम से निकालकर लागातार लोटे में पानी लाये जा रहा था। माँ दुखी मन से कपड़े धोये जा रही थी। इन दृश्यों को देखकर बचपन में अपनी पाठ्य-पुस्तक में पढ़ी स्व0 अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध की लिखी यह बाल कविता याद आ गई। जिसमें कवि कल्पना करता है कि माँ अपने बच्चे को जगाती है, मुँह धोने के लिए पानी लाती है और यह गीत गाती है....
यहाँ तो 'लाल' कह रहा है...
रूको माँ! अब आँसू पोछो
पानी लाया, कपड़े धो लो।
.............
Jan 23, 2014
Jan 7, 2014
Oct 26, 2013
Sep 21, 2013
Sep 14, 2013
पैसिंजर ट्रेन और रोज के यात्री
सूर्योदय से पहले शुरू हो जाती है यात्रा
वापसी - सूर्यास्त के समय
गोधूलि बेला में घरों को लौट रहे हैं चौपाये भी...
सूर्योदय, सूर्यास्त से बेखबर फेंट रहे हैं तास के बावन पत्ते। पता नहीं ये फेंट रहे हैं पत्ते या वक्त इन्हें फेंट रहा है, तास के पत्तों की तरह।
चौपायों और दो पायों में एक बड़ा फ़र्क दिखता है। चौपायों के झुंड के साथ दिखती है लाठी और हाँकने वाला। दो पायों के झुँड के साथ लाठी और हाँकने वाला दोनो अदृश्य हैं।
Subscribe to:
Posts (Atom)





























